MP Gwalior News: ट्री ट्रांसलोकेशन पॉलिसी-2026 तैयार, जियो-टैगिंग से होगी निगरानी

MP Gwalior News: ग्वालियर। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव वाला फैसला दिया है। विकास कार्यों के नाम पर लगातार हो रही पेड़ों की कटाई पर चिंता जताते हुए हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को प्रभावी नीति लागू करने के निर्देश दिए हैं। इसी क्रम में अदालत के समक्ष ‘ट्री ट्रांसलोकेशन पॉलिसी-2026’ का ड्राफ्ट प्रस्तुत किया गया, जिसमें विकास परियोजनाओं के दौरान पेड़ों को काटने के बजाय वैज्ञानिक तरीके से दूसरी जगह स्थानांतरित करने का प्रावधान किया गया है।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि अब विकास और पर्यावरण संरक्षण दोनों को साथ लेकर चलना होगा। अदालत का मानना है कि शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में तेजी से बढ़ रहे निर्माण कार्यों के कारण बड़ी संख्या में पेड़ों की कटाई हो रही है, जिससे पर्यावरण संतुलन प्रभावित हो रहा है। ऐसे में पेड़ों के संरक्षण के लिए ठोस और प्रभावी नीति की आवश्यकता है।

जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान आया मामला

दरअसल, हाईकोर्ट में पेड़ों की कटाई और पर्यावरण संरक्षण को लेकर एक जनहित याचिका दायर की गई थी। याचिका में कहा गया था कि सड़क चौड़ीकरण, फ्लाईओवर, रेलवे लाइन, मेट्रो परियोजनाओं और अन्य विकास कार्यों के लिए बड़ी संख्या में पेड़ों को काटा जा रहा है, जिससे हरित क्षेत्र लगातार कम हो रहे हैं।

मामले की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से जवाब मांगा था और पेड़ों के संरक्षण के लिए स्थायी समाधान प्रस्तुत करने को कहा था। इसी के तहत सरकार ने ‘ट्री ट्रांसलोकेशन पॉलिसी-2026’ का मसौदा तैयार कर अदालत के समक्ष प्रस्तुत किया।

पेड़ों को काटने के बजाय किया जाएगा ट्रांसलोकेट

नई नीति का सबसे महत्वपूर्ण प्रावधान यह है कि विकास परियोजनाओं के रास्ते में आने वाले बड़े और स्वस्थ पेड़ों को काटने के बजाय वैज्ञानिक तकनीकों की मदद से दूसरी सुरक्षित जगह प्रत्यारोपित किया जाएगा। विशेषज्ञों की निगरानी में पेड़ों को जड़ों सहित निकालकर ऐसे स्थानों पर लगाया जाएगा, जहां वे दोबारा विकसित हो सकें।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रक्रिया से वर्षों पुराने पेड़ों को बचाया जा सकेगा और पर्यावरणीय नुकसान भी कम होगा। इससे ऑक्सीजन उत्पादन, जैव विविधता और हरित क्षेत्र सुरक्षित रहेंगे।

जियो-टैगिंग और ऑनलाइन मॉनिटरिंग होगी अनिवार्य

नीति में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए आधुनिक तकनीक का उपयोग किया जाएगा। प्रत्येक प्रत्यारोपित पेड़ की जियो-टैगिंग की जाएगी, जिससे उसकी सटीक लोकेशन दर्ज रहेगी।

इसके अलावा एक ऑनलाइन मॉनिटरिंग सिस्टम विकसित किया जाएगा, जिसके माध्यम से पेड़ों की स्थिति, उनकी वृद्धि और संरक्षण संबंधी जानकारी लगातार अपडेट की जाएगी। इससे यह सुनिश्चित किया जा सकेगा कि प्रत्यारोपित पेड़ जीवित हैं और उनकी उचित देखभाल हो रही है।

जिला स्तर पर गठित होंगी विशेष समितियां

नई नीति के तहत प्रत्येक जिले में विशेष निगरानी समितियों का गठन किया जाएगा। इन समितियों में प्रशासनिक अधिकारियों, वन विभाग, पर्यावरण विशेषज्ञों और तकनीकी विशेषज्ञों को शामिल किया जा सकता है।

समितियां यह सुनिश्चित करेंगी कि किसी भी परियोजना में पेड़ों को काटने से पहले सभी विकल्पों पर विचार किया जाए और ट्रांसलोकेशन की प्रक्रिया निर्धारित मानकों के अनुसार पूरी की जाए। साथ ही समय-समय पर निरीक्षण कर रिपोर्ट भी तैयार की जाएगी।

लापरवाही पर लगेगा जुर्माना, एजेंसियां होंगी ब्लैकलिस्ट

हाईकोर्ट के निर्देशों के अनुरूप तैयार की गई नीति में सख्त दंडात्मक प्रावधान भी शामिल किए गए हैं। यदि कोई एजेंसी निर्धारित नियमों का पालन नहीं करती या प्रत्यारोपित पेड़ों के संरक्षण में लापरवाही बरतती है तो उस पर आर्थिक जुर्माना लगाया जाएगा।

गंभीर मामलों में संबंधित एजेंसी को ब्लैकलिस्ट भी किया जा सकता है, जिससे भविष्य में उसे सरकारी परियोजनाओं में काम करने से वंचित किया जा सकेगा।

पर्यावरण संरक्षण की दिशा में ऐतिहासिक कदम

पर्यावरणविदों और सामाजिक संगठनों ने हाईकोर्ट के इस कदम का स्वागत किया है। उनका कहना है कि विकास कार्यों के साथ पर्यावरण संरक्षण को प्राथमिकता देना समय की मांग है। यदि यह नीति प्रभावी रूप से लागू होती है तो मध्य प्रदेश देश के उन राज्यों में शामिल हो सकता है, जहां विकास और पर्यावरण के बीच बेहतर संतुलन स्थापित किया गया है।

हाईकोर्ट के इस फैसले को प्रदेश में हरित विकास मॉडल की दिशा में एक ऐतिहासिक पहल माना जा रहा है। आने वाले समय में इसका असर न केवल पर्यावरण संरक्षण पर पड़ेगा, बल्कि भावी पीढ़ियों के लिए भी बेहतर प्राकृतिक संसाधनों को सुरक्षित रखने में मदद मिलेगी।

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