वक्त को थाम लेती है हिंदुस्तानियों की कलाई पर बंधे इतिहास की कहानी

रिव्यू के लिए कंटेंट देखने के शौक में एक बीमारी भी हम फिलमचियों को लग जाती है— कंटेंट में बहुत बारीकी से खोट निकालना. मेड इन इंडिया: अ टाइटन स्टोरी की शुरुआत में भी ऐसे खोट दिखने शुरू हुए थे. जिम सर्भ और बाकी एक्टर्स के चेहरों पर उम्र बढ़ने के साथ कोई बदलाव नहीं दिखते. 1980 के दशक से शुरू होकर 2011 तक पहुंचने वाली इस कहानी में विजुअल्स देखकर बता पाना मुश्किल है कि वक्त बदल चुका है. मगर अ टाइटन स्टोरी थोड़ी ही देर में आपको ऐसा लपेटती है कि फिर लगातार देखे बिना रह पाना मुश्किल लगने लगता है.
घड़ियों का एक टॉप ब्रांड बनने वाली कंपनी की कहानी वैसे तो कॉर्पोरेट ड्रामा के बॉक्स में ही रखी जा सकती है. लेकिन अ टाइटन स्टोरी में रॉबी ग्रेवाल ने कॉर्पोरेट ड्रामा को, ह्यूमन ड्रामा बनाए रखने की कला बखूबी साधी है. स्वर्गीय जे आर डी टाटा भले उद्योगपति थे, लेकिन आजादी के बाद किसी नए प्रोजेक्ट की तरह खड़े होते भारत के लिए उनके योगदान की कहानियां खूब सुनने-पढ़ने में आती हैं. मगर उन्होंने किस तरह जरक्सेस देसाई के ‘मेड इन इंडिया’ घड़ी बनाने के सपने को गाइड किया, ये कहानी स्क्रीन पर इतनी एंगेजिंग निकलेगी ये नहीं सोचा था.
शो में नसीरुद्दीन शाह जे आर डी टाटा के रोल में हैं. जिम सर्भ ने रॉकेट बॉयज में होमी भाभा के बाद, अब एक और पारसी आइकॉन जरक्सेस देसाई का रोल निभाया है. इन दोनों के अलावा टाइटन की कहानी लिखने वाले कई रियल किरदारों के फिक्शनल वर्जन भी हैं. आकाश बंसल (वैभव तत्ववादी), जरक्सेस के सपने में पहले साथी हैं. एक सीक्वेंस में उनकी टीम उन्हें ‘टाइटन की मां’ बताती है. मेघा म्हात्रे (कावेरी सेठ) मार्केटिंग डिपार्टमेंट संभालती हैं और जरक्सेस-आकाश की टीम में सबसे पहली एम्प्लॉयी बनती हैं. दूसरा एम्प्लॉयी बनकर इंजीनियर गौरव धर (लक्षवीर सरन) आते हैं. पहले एपिसोड से ये टीम जब एक घड़ी बनाने का सपना लेकर सफर पर निकलती है, तभी से आप इस सपने के साथ हो लेते हैं.
जरक्सेस को टाटा साहब ने उनका एक डूबता वेंचर बचाने को दिया है, लेकिन वो घड़ी बनाने का आइडिया सामने रख देता है. मजबूत सरकारी नौकरी कर रहा आकाश जरक्सेस के भरोसे पर सब छोड़-छाड़ के आ जाता है. लेकिन टाटा साहब ने अभी इस आइडिया पर अप्रूवल ही नहीं दिया और विदेश निकल लिए हैं. उधर टाटा को स्विस घड़ी कंपनी के मालिक की ये बात दिल पर लग जाती है कि भारत कभी वर्ल्ड क्लास घड़ी बना ही नहीं सकता.
मेघा की मां का जिंदगी में बस एक ही पैशन है— अपनी बेटी की शादी करवाना. लेकिन मेघा को किसी मर्द पर भरोसा नहीं है, उसे खुद की पहचान बनानी है. आकाश इंजीनियर है और मशीनों की संगत में ही रहना चाहता है. ये सारे सपने जहां आकर मिलते हैं, उस जमीन पर एक पूरी तरह इंडियन घड़ी बनाने का सपना नींव पाता है. क्योंकि उससे पहले घड़ी बना रहीं इंडियन कंपनियों के साथ कोई न कोई विदेशी पार्टनर जुड़ा था.
अभी तो सिर्फ टीम जुटी है, लोन लिया जाना है. फैक्ट्री के लिए जमीन चाहिए, जहां मॉइस्चर-डस्ट न हो— घड़ी के पार्ट्स पर इन सब चीजों का असर पड़ता है. लोग चाहिए जो घड़ी बना सकें और इस बारीक काम के लिए उनके हाथ भी साधने होंगे. अनुभवी उस्तादों की जरूरत होगी. और एक नाम भी तो तय करना है जो सिर्फ कंपनी के प्रोडक्ट की नहीं, उस फीलिंग की पहचान हो जिसके लिए जरक्सेस और टाटा साहब ने इस सपने को पंख दिए.

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