Bilaspur News: नाबालिग से दुष्कर्म के आरोपी को हाईकोर्ट से राहत, अभियोजन आरोप संदेह से परे साबित करने में रहा नाकाम

Chhattisgarh Bilaspur News: बिलासपुर। नाबालिग से दुष्कर्म और अपहरण के मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने आरोपी दिनेश यादव को सभी आरोपों से बरी कर दिया है। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की बेंच ने कहा कि अभियोजन पक्ष पीड़िता की उम्र 18 वर्ष से कम होने और जबरन यौन संबंध बनाए जाने के आरोपों को संदेह से परे साबित नहीं कर सका।

हाईकोर्ट ने दिनेश यादव की आपराधिक अपील स्वीकार करते हुए प्रथम अतिरिक्त सत्र एवं विशेष न्यायाधीश, कुनकुरी द्वारा 10 फरवरी 2022 को सुनाई गई सजा को रद्द कर दिया। ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को भारतीय दंड संहिता की धारा 363 के तहत दो साल, धारा 366 के तहत पांच साल और पॉक्सो अधिनियम की धारा 6 के तहत 20 वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी।

मामले में अभियोजन ने पीड़िता की जन्म तिथि 16 जुलाई 2005 साबित करने के लिए स्कूल के दाखिल-खारिज रजिस्टर और कक्षा आठवीं की अंकसूची पर भरोसा किया था। हालांकि, स्कूल के सहायक शिक्षक ने जिरह के दौरान स्वीकार किया कि संबंधित प्रविष्टि उन्होंने स्वयं नहीं की थी और उन्हें यह जानकारी भी नहीं थी कि जन्म तिथि किस दस्तावेज या आधार के अनुसार दर्ज की गई थी।

पीड़िता के माता-पिता ने भी अदालत में कहा कि उन्हें बेटी की वास्तविक जन्म तिथि की जानकारी नहीं थी। दोनों अशिक्षित थे और उन्होंने पीड़िता की उम्र लगभग 14 वर्ष बताई थी। हाईकोर्ट ने माना कि ऐसी स्थिति में उम्र साबित करने के लिए जन्म प्रमाण पत्र या अन्य प्राथमिक और विश्वसनीय दस्तावेज पेश किए जाने चाहिए थे।

सुनवाई के दौरान डिवीजन बेंच ने पीड़िता के बयानों और घटनाक्रम की परिस्थितियों पर भी गौर किया। कोर्ट ने पाया कि पीड़िता दोनों अवसरों पर माता-पिता को बताए बिना सामुदायिक भवन के पास पहुंची और आरोपी के साथ मोटरसाइकिल से गई। रास्ते में कई लोग मिले, लेकिन उसने न तो शोर मचाया और न किसी से मदद मांगी। आरोपी के घर पर भी वह लंबे समय तक रही और इस दौरान किसी व्यक्ति को घटना की जानकारी नहीं दी।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यौन अपराध के मामलों में केवल पीड़िता की गवाही के आधार पर भी दोषसिद्धि की जा सकती है, लेकिन ऐसी गवाही पूरी तरह विश्वसनीय और भरोसा पैदा करने वाली होनी चाहिए। मौजूदा मामले में पीड़िता के बयान में मौजूद विसंगतियों और परिस्थितियों के कारण अभियोजन की कहानी पर उचित संदेह पैदा हुआ।

मेडिकल जांच में भी पीड़िता के शरीर या जननांगों पर कोई बाहरी या आंतरिक चोट, खरोंच या अन्य चोट नहीं मिली। डॉक्टर ने हाइमन पुराना फटा हुआ पाया और माना कि पीड़िता पहले यौन संबंध बना चुकी थी। हालांकि, जबरन यौन संबंध बनाए जाने के समय की कोई शारीरिक चोट नहीं मिली। डॉक्टर ने जिरह के दौरान यह भी माना कि शारीरिक विकास के आधार पर पीड़िता वयस्क प्रतीत होती थी। एफएसएल रिपोर्ट में भेजे गए नमूनों और वस्तुओं पर वीर्य या मानव शुक्राणु नहीं मिले।

डिवीजन बेंच ने कहा कि आपराधिक मामले में अभियोजन को आरोप संदेह से परे साबित करना होता है। मजबूत संदेह प्रमाण का विकल्प नहीं हो सकता। कोर्ट ने पाया कि इस मामले में अभियोजन पीड़िता के नाबालिग होने और जबरन यौन संबंध के आवश्यक तत्वों को संदेह से परे साबित करने में विफल रहा। इसके बाद हाईकोर्ट ने दिनेश यादव की दोषसिद्धि और सजा का फैसला रद्द करते हुए उसे सभी आरोपों से बरी कर दिया।

शेयर करें

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *