Bilaspur News: स्वतंत्र गवाह मुकरने के बावजूद बरकरार रही दोषसिद्धि, सुप्रीम कोर्ट ने विशेष अनुमति याचिका की खारिज

Chhattisgarh Bilaspur News: बिलासपुर। जशपुर जिले के दानिमुड़ा निवासी मुकेश राम यादव को 40 किलो गांजा बरामदगी के मामले में मिली 14 साल के कठोर कारावास और एक लाख रुपये जुर्माने की सजा बरकरार रहेगी। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट द्वारा 15 जून 2026 को उसकी अपील खारिज किए जाने के बाद मामले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने 29 सितंबर को विशेष अनुमति याचिका खारिज करते हुए हाई कोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं माना।

अंबिकापुर के विशेष न्यायालय ने 6 मार्च 2025 को मुकेश राम यादव को स्वापक औषधि और मन:प्रभावी पदार्थ अधिनियम की धारा 20(बी)(ii)(सी) के तहत दोषी ठहराया था। अदालत ने उसे 14 साल के कठोर कारावास के साथ एक लाख रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई थी। जुर्माना जमा नहीं करने पर दो वर्ष का अतिरिक्त कारावास भुगतने का आदेश दिया गया था।

अभियोजन के अनुसार 7 अप्रैल 2024 को आबकारी उड़नदस्ता के सहायक जिला आबकारी अधिकारी को सूचना मिली थी कि स्मृति वाटिका, संदबर के पास एक वाहन में बड़ी मात्रा में गांजा रखा गया है। टीम मौके पर पहुंची तो वहां वाहन क्रमांक सीजी-10-एसी-1447 खड़ा मिला और मुकेश राम यादव भी मौके पर मौजूद था। वाहन की तलाशी के दौरान डिक्की से दो सफेद बोरियां बरामद हुईं, जिनमें गांजा मिला। तौल करने पर गांजे की कुल मात्रा 40 किलो पाई गई।

हाई कोर्ट में बचाव पक्ष की ओर से तर्क दिया गया कि स्वतंत्र गवाहों ने अभियोजन के मामले का समर्थन नहीं किया और केवल सरकारी कर्मचारियों के बयानों के आधार पर दोषसिद्धि नहीं की जा सकती। हाई कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि स्वतंत्र गवाहों के मुकर जाने मात्र से सरकारी गवाहों की विश्वसनीयता समाप्त नहीं होती। जांच अधिकारी के बयान को अन्य सरकारी गवाहों और दस्तावेजी साक्ष्यों से समर्थन मिलने की बात भी कोर्ट ने मानी।

हाई कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि बरामदगी सार्वजनिक स्थान पर हुई थी, इसलिए मामले में एनडीपीएस एक्ट की धारा 43 लागू होगी, न कि धारा 42। वहीं, गांजा मुकेश के नियंत्रण वाले वाहन की डिक्की से बरामद होने के कारण व्यक्तिगत तलाशी से संबंधित धारा 50 की सुरक्षा का प्रश्न लागू नहीं माना गया।

अदालत ने 40 किलो गांजे को वाणिज्यिक मात्रा मानते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष मुकेश के सचेत और विशेष कब्जे को संदेह से परे साबित करने में सफल रहा। इसी आधार पर हाई कोर्ट ने उसकी अपील खारिज करते हुए विशेष न्यायालय की सजा बरकरार रखी थी।

मुकेश की ओर से मां की गंभीर बीमारी के आधार पर अंतरिम जमानत की मांग भी की गई थी, जिसे खारिज कर दिया गया। हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंचने पर भी उसे राहत नहीं मिली और 29 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने विशेष अनुमति याचिका खारिज कर दी।

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